आनंदी गोपाल जोशी :- भारत की पहली महिला चिकित्सक, एक प्रेरक संघर्ष

2 weeks ago
desiCNN
दर्द, न पूछो कितने थे, कुछ बड़े, कुछ छोटे, लेकिन तरह-तरह के। उनका एक सिलसिला-सा उस किशोरी की जिंदगी में चल रहा था। कभी लगता, दर्द हो गई है जिंदगी, तो कभी लगता जिंदगी में दर्द के सिवा कुछ नहीं है। दर्द कभी दिल से फूटते, कभी देह से रिसते, तो कभी आंखों से बह निकलते। असह्य प्रसव वेदना से गुजरी महज 14 की नाजुक उम्र और गोद में ऐसा नवजात शिशु, जिसका ज्वर मानो उतरने की राह भूल गया था।दर्द के दिन ऐसे चल रहे थे कि बहुत मुश्किल से अपनी ही देह संभलती थी। कभी लगता अंदर-बाहर से पूरी देह ही घाव में तब्दील हो गई हो, लेकिन अपने दर्द को कहीं दबाना-छिपाना पड़ता था। नवजात शिशु कभी जोर-जोर रोता और कभी बेसुध-सा पड़ जाता। वह अबोध मां अपने शिशु के रोने से भी मचल उठती थी और जब वह ज्वर से बेसुध हो जाता, तो दिल बहुत तेज धड़कने लगता था। लाड़ले शिशु को बार-बार बरबस ही छाती से लगा लेती, उससे बातें करती, ‘बेटा-बेटा आंख...........

For More Download the App