तीन राज्यों में हार के बाद विभ्रम की स्थिति में भाजपा :- क्या, क्यों और कैसे?

2 months ago
शंकर शरण
‘देवालय से ज्यादा जरूरी शौचालय है’, ‘‘आर्थिक विकास सारी समस्याओं का समाधान है’’ जैसे गहन विचार तथा ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ जैसा लक्ष्य रखने वाले नेता अब इन बातों को नहीं दुहरा रहे। इस के बदले जहाँ-तहाँ अंधेरे में सिर पटक रहे हैं कि कोई हैंडल मिले। इस बीच, उन के समर्थक क्या करें? केवल इंतजार, कि दैवयोग से कोई घटना हो जिस से अपने नेता और दल के समर्थन में किसी तरह का अभियान चला सकें। इतनी शक्ति मिल जाने के बाद भी ऐसी बेबसी वैचारिक दिवालिएपन का ही उदाहरण है! आखिर, सही विचारों के बिना सही दिशा नहीं मिल सकती। हम यह भी नहीं कहते या कि यह या वह काम होना चाहिए था। जबकि निस्संदेह अनेक ऐसे मूल्यवान काम निर्विवाद और बिना अतिरिक्त बजट के किए जा सकते थे, जिस से बड़े राष्ट्रीय हित सधते। पर अभी वह छोड़ें। केवल यह देखें कि क्या गलत और फूहड़ बयानबाजियों से भी नहीं बचा जा सकता था? वह ...........

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