पौराणिक मान्यताओं पर प्रश्नचिन्ह क्यों ?

12 years ago
Suresh Chiplunkar
क्या किसी देश का इतिहास या उसकी पौराणिक मान्यतायें शर्म का विषय हो सकती हैं ? यदि हजारों वर्षों के इतिहास में कोई शर्म का विषय है भी, तो उसके मायने अलग-अलग समुदायों के लिये अलग-अलग क्यों होना चाहिये ? यह सवाल आजकल कई लोगों के मनोमस्तिष्क को झकझोर रहा है । इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना शासकों का प्रिय शगल रहा है, लेकिन जब बुद्धिजीवी वर्ग भी उसी मुहिम में शामिल हो जाये तो फ़िर यह बहस का विषय हो जाता है. मंगल पांडे पर एक फ़िल्म बनती है और सारे देश में उसके बारे में चर्चा होने लगती है, पोस्टर फ़ाडे जाने लगते हैं, चाणक्य पर एक धारावाहिक बनता है, तत्काल उसे सांप्रदायिक घोषित करने की मुहिम चालू हो जाती है, ऐसा ही कुछ रामायण के बारे में भी करने की कोशिश की गई थी, लेकिन चूँकि रामायण जन-जन के दिल में बसा है, इसलिये विरोधियों को उस वक्त मौके की नजाकत देखते हुए चुप बैठना पडा़ । लेकिन जिस तर...........

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