राजनीति :-- गिरता चरित्र, घटती साख, अमर्यादित भाषा

2 weeks ago
desiCNN
राजनीति का यह दौर वैचारिक और सैद्धांतिक रुप से संक्रमण का है। राजनीति हर पल एक नयी भाषा और परिभाषा गढती दिखती है। वैचारिकता की जमींन सै़द्धांतिक रुप से बंजर हो चली है। विचारों का कोई चरित्र है न चेहरा। सियासत में चहुंओर सिर्फ सत्ता के लिए संघर्ष है। जुमले गढ़ती राजनीति वैचारिता को पालती पोषती नहीं दिखती। राजनीतिक दलों में विचाराधारा सिद्धांत नहीं बन पा रही। राजनीति की बदलती परिभाषा में यह कहना मुश्किल है कि विचारों का सि़द्धांत होता है या फिर अपनी सुविधा के अनुसार विचार और सिद्धांत बनाए बिगाड़े जाते हैं। सत्ता हो या प्रतिपक्ष उसके तथ्य और कथ्य में स्थाईत्व नहीं दिखता है। राजनीति का मकसद सिर्फ सत्ता का संघर्ष हो चला है। तकनीकी रुप से राजनीति परिमार्जित तो हुई है, लेकिन भाषायी और वैचारिकता तौर पर परिष्कृत नहीं हो पायी। जबकि हमारा लोकतंत्र बेहद सुदृढ़ हु...........

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