स्वर्गीय देवेन्द्र स्वरूप... एक ऋषि, एक प्रकाश स्तंभ

3 months ago
अभिजीत सिंह
बिहार में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ कार्य प्रचार होने के बिलकुल शुरूआती दौर की बात है। एक प्रचारक को बिहार में संघ कार्य शुरू करने के लिये भेजा गया था। एक किसी बड़े प्रभावशाली व्यक्ति से जब वो सम्पर्क करने गये तो कई दिनों बाद उनसे उनका मिलना हो सका। जब मिले तो उस व्यक्ति ने इस प्रचारक से पूछा:- जिस संघ का प्रचार करने आये हो उसका साहित्य क्या है? उसके आदर्श व्यक्तित्व कौन हैं और उसका दर्शन क्या है? उस प्रचारक ने जो जबाब दिया उसके बस उस जबाब ने बिहार कार्य में संघ की मजबूत बुनियाद रख दी। उन्होंने उत्तर में कहा था :- संघ का साहित्य, आदर्श व्यक्तित्व और उसका दर्शन मैं, मेरा व्यवहार और मेरा चरित्र है। उस समय संघ शैशवावस्था में था इसलिये उसका कोई साहित्य सृजित नहीं हुआ था, किसी बड़े नेता का नाम या चेहरा उसके पास नहीं था और न ही वैसा कोई दर्शन तो उस प्रचारक ने जो उत्तर दिया ...........

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