ASI की तकनीकी और वैज्ञानिक रिपोर्ट भी नकार देते हैं, नकली वामी इतिहासकार

2 weeks ago
desiCNN
इसमें दो राय नहीं कि सत्‍य के उद्‌घाटन के अतिरिक्‍त इतिहास की कोई वैचारिक अथवा सांस्कृतिक प्रतिबद्धता नहीं होनी चाहिए। इतिहास में धर्मनिरपेक्ष सोच अथवा पंथनिरपेक्ष मूल्‍यों का भी समावेश नहीं होना चाहिए, क्‍योंकि तटस्‍थ दृष्टिकोण से लिखा इतिहास तो होता ही धर्म अथवा पंथ निरपेक्ष है। इतिहास आस्‍था का आधार अथवा विश्‍वास का प्रतीक भी नहीं होना चाहिए, क्‍योंकि आस्‍था, विवेक और तर्क का शमन करती है। इतिहास बौद्धिक कट्‌टरता का निष्‍ठावान अनुयायी भी नहीं होना चाहिए, क्‍योंकि इतिहास से संबद्ध सांस्कृतिक संकीर्णता, सांप्रदायिकता से कम खतरनाक नहीं है। इसलिए जब किसी प्रकरण से जुड़े नए साक्ष्‍य और प्रमाण उपलब्‍ध हुए हों तो उनकी प्रामाणिकता सत्‍यापित होने पर इतिहास-दृष्‍टि बदलना जरूरी हो जाता है। दरअसल, इतिहास की वही लिपिबद्धता सार्थक और शाश्‍वत होगी, जो अतीत को...........

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